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मिलिए हॉस्पिटल के सामने फू-फू करते नंदू से

‘क्या नंदू, हॉस्पिटल के सामने खड़े हो के फू-फू कर रहा है?’
‘बीवी बीमार है, अंदर है।’
‘क्या हुआ भाभी को?’
‘वही औरतों वाली बीमारी।’

पिछले साल-डेढ़ साल में यदि आपने किसी थिएटर में जाकर कोई फिल्म देखी है तो फिल्म से पहले आने वाले इस विज्ञापन को जरूर देखा होगा जिसमें अक्षय कुमार अपने दोस्त नंदू को सैनिटरी पैड के महत्व के बारे में समझाते हैं। हर बार यह विज्ञापन देख कर कभी मन में यह ख्याल भी आता है कि यह नंदू आखिर है कौन जिसे अक्षय कुमार जैसे नामी सितारे के साथ यह विज्ञापन करने का मौका मिला और जिसमें वह एकदम सहज और विश्वसनीय अभिनय भी कर रहा है। बहुत खोजबीन के बाद हम पहुंचे इस नंदू तक और पता चला कि इन महाशय का नाम अजय सिंह पाल है। ग्वालियर में जन्मे और भोपाल में पले-बढ़े अजय कुछ एक फिल्मों के अलावा कई टी.वी. धारावाहिकों में भी काम कर चुके हैं। फिलहाल अजय भोपाल में रहते हैं और एक बिजनेस चलाने के अलावा स्थानीय थिएटर पर भी लगातार सक्रिय हैं। आइए आपको उनसे मिलवाते हैं।

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-अभिनय की तरफ रुझान कैसे और किस उम्र में आया?

-मैं जब कॉलेज में आया तो हमारे एक प्रोफेसर थे अशोक परिहार जी, जो कॉलेज के एनुअल फंक्शन के लिए एक नाटक तैयार कर रहे थे। मुझे अभिनय में दिलचस्पी तो थी लेकिन मेरे अंदर मंच पर जाने का आत्मविश्वास नहीं था। तो जब बाकी दोस्त बतौर एक्टर चुने गए तो मैंने कहा कि मैं स्टेज के पीछे के काम संभाल लूंगा। और इस तरह से मैं उनसे जुड़ गया। लेकिन फंक्शन से हफ्ता भर पहले मुख्य किरदार निभाने वाला लड़का कहीं चला गया। तब उन्होंने मुझे कहा कि कोई नया लड़का लेंगे तो उसे समझने में देर लगेगी। तुम इतने दिन से सब देख ही रहे हो तो तुम ही इसे कर लो। तो मैंने भी हिम्मत कर के उसे कर लिया। उसमें इतनी ज्यादा तालियां मिलीं कि मेरा सारा डर दूर हो गया। वहां कुछ सीनियर एक्टर भी आए हुए थे तो उन्होंने मुझे भारत भवन रंग मंडल की रिपर्टरी में काम करने की सलाह दी और इस तरह से मैं पूरी तरह से रंगमंच की दुनिया में आ गया।

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-यानी आपने कभी कहीं से अभिनय की औपचारिक शिक्षा नहीं ली?

-नहीं। मैं तो जिन निर्देशकों के साथ काम करता रहा, उनसे और अपने सीनियर कलाकारों से सीखता रहा और आज तक भी कुछ न कुछ लगातार सीख ही रहा हूं।

-थिएटर करते-करते मुंबई जाने का मन नहीं हुआ?

-बिल्कुल हुआ और एक दिन मैं भी आंखों में सपने लिए मुंबई चला गया। और वहां मुझे कोई खास संघर्ष भी नहीं करना पड़ा क्योंकि नौवें ही दिन मुझे एनडीटीवी इमेजिन चैनल पर ‘जमुनिया’ सीरियल में छोटे मामा का किरदार मिल गया था। असल संघर्ष तो इस सीरियल के खत्म होने के बाद शुरू हुआ। लेकिन काम मुझे लगातार मिलता रहा। ‘अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो’, ‘छोटी बहू’, ‘लाडो’ जैसे बहुत सारे धारावाहिकों में मैंने काम किया।

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-फिल्में कौन-कौन सी कीं आपने?

-फिल्मों में मुझे ज्यादा काम नहीं मिल पाया। आमिर खान प्रोडक्शंस की ‘पीपली लाइव’ की थी। प्रकाश झा की ‘राजनीति’ में काम किया, ‘शक्ल पे मत जा’ की। और भी कुछ एक फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किए लेकिन कुछ बड़ा या तो मुझे मिला नहीं या फिर मिलने के बाद हाथ से निकल गया। उसके बाद हुआ यह कि मुंबई में मैं बीमार रहने लगा। बहुत इलाज चला लेकिन कुछ बात नहीं बनी। तब किसी डॉक्टर ने मुझ से कहा कि शायद मुंबई का वातावरण मुझे रास नहीं आ रहा है। इसके बाद मैं भोपाल लौट आया और कुछ समय बाद ठीक होने लगा।

-दोबारा से मुंबई नहीं गए?

-नहीं। मन ही नहीं हुआ। एक तो यहां मैंने अपना एक बिजनेस सैट कर लिया था और दूसरा कारण यह भी था कि कहीं वहां जाने से बीमारी लौट न आए। तो मैंने खुद को समझा लिया और यहीं का होकर रह गया।

-फिर यह सैनिटरी पैड वाला विज्ञापन आपको कैसे मिला?

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-यह तो मुझे इसलिए मिला क्योंकि अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ में मैंने भी काम किया था। इस फिल्म की शूटिंग यहीं मध्यप्रदेश में ही हुई जिसके लिए यहां पर भी ऑडिशन हुए थे। मैंने इस फिल्म में रुई के व्यापारी का किरदार निभाया था और आपको जान कर हैरानी होगी कि असल में यह विज्ञापन इस फिल्म के प्रचार के लिए बनाया गया था। लेकिन यह इतना ज्यादा प्रभावी बन गया कि सरकार ने इसे ले लिया और लोग इसी से मुझे पहचानने लगे।

-क्या आपको लगता है कि ‘पैडमैन’ जैसी फिल्मों या इस किस्म के विज्ञापनों से आम लोगों पर असर पड़ता है?

-बिल्कुल पड़ता है। इस विज्ञापन के आने के बाद गांव-देहात के या कम पढ़े-लिखे आदमी को भी यह पता चलता है कि उसके शौक की छोटी-सी कीमत पर वह अपनी पत्नी को बीमारियों से दूर रख सकता है।

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-तो अब आप जो कर रहे हैं, उससे संतुष्ट हैं?

-एक कलाकार के तौर पर मैं जो करता हूं, पूरे मन से करता हूं और इसलिए संतुष्ट हूं। लेकिन यह मलाल तो रहता ही है कि मुंबई से दूर रहने वाले हम जैसे कलाकारों को फिल्मों में कोई बड़ा किरदार नहीं मिल पाता। इधर मध्यप्रदेश में बहुत सारी फिल्मों की शूटिंग होने लगी है और उनमें स्थानीय कलाकारों को काम भी मिल रहा है लेकिन उन्हें बस इसलिए लिया जाता है ताकि मुंबई से कलाकारों को लाने का खर्चा बच जाए। इसलिए मैं अपने नाटकों वगैरह में ही खुश रहता हूं।

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(नोट-इस आलेख के संपादित अंश ‘हरिभूमि’ समाचार-पत्र में 23 फरवरी, 2020 को प्रकाशित हुए हैं)

लेखक 

दीपक दुआ 

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.comके अलावा विभिन्न समाचार पत्रोंपत्रिकाओंन्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

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