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जानिए छठ में सूर्य के सामने घंटों क्यों खड़ी रहती है महिलाएं, क्यों लगाती है लम्बा सिंदूर ?

छठ का महापर्व 31 अक्टूबर से शुरू हो चुका है जो 3 नवंबर तक चलेगा। ये पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता है जिसके पहले दिन नहाय खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन व्रत रख सूर्य को संझिया अर्घ्य और चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न किया जाता है। ये व्रत इस तरह से 36 घंटे तक निर्जला रखा जाता है और इस व्रत में छठ मैया और सूर्य देव की अराधना की जाती है।

छठ महापर्व : महिलाओं का 36 घंटे का निर्जला व्रत हुआ शुरू

लोकपर्व देता है सीख

वही यह त्यौहार जल-संरक्षण, स्वच्छता, पवित्रता, प्रकृति पूजा, प्राकृतिक वस्तुओं के उपभोग, अन्न-फल-जल पूजन, सामाजिक समरसता, जीवनदायी भगवान भास्कर की उपासना के साथ साथ उनके प्रति आभार प्रकट करने जैसे तमाम उत्तम आचरणों और संस्कारों को आत्मसात करने का संदेश देने वाला लोकपर्व है।

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पद्मश्री डॉ के के शर्मा कहते है

वही इस पुरे पर्व को वैज्ञानिक नज़रिये से देखें तो पद्मश्री डॉ के के अग्रवाल कहते है – इस पर्व में महिलाएं सूर्य की उपासना करती है। इससे उनमें विटामिन डी की डेफिशियेंसी कम होती है। वही प्रसाद में चढ़ने वाले सभी भोग कैल्शियम युक्त होते है और मौसम के बदलाव के कारण होने वाली बिमारियों से भी बचते है। वही बात करें सिंदूर की तो वो टैनिंग से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। देखें वीडियो –

व्रती महिलायें नाक से माथे तक लम्बा सिंदूर क्यों लगाती हैं ?

इस प्रश्न पर प्रतिक्रिया देते हुए

usha kiran khan

प्रख्यात लेखिका उषा किरण खान ने कहा कि सिंदूर अनुराग का रंग और सुहाग का प्रतीक है। लम्बा सिंदूर लगा कर व्रती महिला अपने लिए अनुरागपूर्ण लम्बे वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।

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वही, इसी प्रश्न पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए

फ़िल्मकार कमलेश के मिश्र ने कहा कि छठ में व्रती महिला सूर्य की आराधना करतीं हैं, जिनकी उगती और ढलती किरणों का रंग सिंदूरी होता है। सूर्य की उगती और ढलती किरणों का सिंदूरी रंग व्रती महिला के माथे पर लगे सिंदूर के रंग से मेल खाकर उन्हें तेजोमय करे, सूर्य की आभा उनके जीवन को प्रकाशित और प्रभावित करे, इस कामना के साथ भी व्रती महिला अपने माथे पर लम्बा सिंदूर लगाती हैं।

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शरीर की इम्यूनिटी के लिए बेस्ट है प्रसाद

सूर्य की रोशनी यानी धूप न केवल हमारी सेहत के लिए जरूरी है, बल्कि प्रकृति के संरक्षण और संपन्‍नता के लिए भी जरूरी है। आटे-गुड़ और घी का बना ठेकुआ सेहत के लिए फायदेमंद है। इससे सर्दियों में होने वाली संक्रमण संबंधी समस्‍याओं से छुटकारा मिलता है। गन्ने को पाचन शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है।चकोतरा या डाभ नींबू ऊपर से पीला और अंदर से लाल होता है। विटमिन सी से भरा होने के कारण यह फल तमाम तरह के संक्रमण से बचाता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को भी बढ़ाता है। चावल न केवल बॉडी को हाइड्रेट रखता है, बल्कि यह पचने में भी आसान है। केला मैग्निशियम और पोटैशियम से भरपूर होता है। नारियल ऐंटिऑक्‍सिडेंट गुणों के कारण सेहत और सौंदर्य दोनों के लिए फायदेमंद है।

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पौराणिक कथा

पुराणों में इस व्रत को लेकर पौराणिक कथा प्रचलित है। इसमें प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं । नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ। संतान शोक में वह आत्म हत्या का मन बना लिया। लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं। देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि के दिन देवी षष्ठी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा।
बता दें, छठे दिन पूजी जाने वाली षष्ठी मइया (Sasthi Maiya) को छठी मइया (Chhathi Maiya) कहकर पुकारते हैं. मान्यता है कि छठ पूजा (Chhath Puja) के दौरान पूजी जाने वाली यह माता सूर्य भगवान की बहन हैं. इसीलिए लोग सूर्य को अर्घ्य देकर छठ मैया को प्रसन्न करते हैं.

 

 

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