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जानिए दीपावली से लेकर भैया दूज तक का महत्व

दीपावली एक दिन का पर्व नहीं बल्कि पांच दिन तक चलने वाला महापर्व है। धनतेरस से शुरू होने वाला यह त्योहार नरक चौदस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैयादूज पर जाकर खत्म होता है। हर दिन पड़ने वाले पर्व का अपना एक महत्व है।

1.धनतेरस: भगवान धन्वंतरी की पूजा होती है

दिवाली से पहले आने वाले पर्वों में पहला पर्व है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी। इस दिन समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक आयुर्वेदाचार्य धन्वंतरी हाथ में अमृत-कलश लिए प्रकट हुए थे। इनके दृष्टिपात से सूखी खेती हरित होकर लहलहा उठती थी। मृत जीवित हो आता था। विधाता के कार्य में यह बहुत बड़ा व्यवधान पड़ गया। सृष्टि में भयंकर अव्यवस्था उत्पन्न होने की आशंका के भय से देवताओं ने इन्हें छल से लोप कर दिया। वैद्यगण इस दिन धन्वंतरी जी का पूजन करते हैं और वर मांगते हैं कि उनकी औषधि व उपचार में ऐसी शक्ति आ जाए जिससे रोगी को स्वास्थ्य लाभ हो। गृहस्थ इस दिन अमृत पात्र को स्मरण कर नए बर्तन घर में लाकर धनतेरस मनाते हैं। इस दिन ही बहुत समय से चले आ रहे मनो मालिन्य को त्याग कर यमराज ने अपनी बहिन यमुना से मिलने के लिए स्वर्ग से पृथ्वी की ओर प्रस्थान किया था। गृहणियां इस दिन से अपनी देहरी पर दीपक दान करती हैं जिससे यमराज, मार्ग में प्रकाश देखकर प्रसन्न हों और उनके गृह जनों के प्रति विशेष करुणा रखें।

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2. नरक चौदस: भगवान विष्णु ने लिया था वामन अवतार

महापर्व की लड़ी का दूसरा मोती है “चतुर्दशी&#8217″। यह भगवान श्रीराम के परम भक्त व पराक्रम के प्रतीक हनुमान की जयंती का दिन है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस दिन अत्याचारी व दंभी नरकासुर का वध करके उसकी कैद से सोलह हजार कन्याओं व अन्य कैदियों को मुक्त किया था। इस असुर ने अपनी अंतिम इच्छा बड़ी विनय के साथ प्रकट की थी। भगवान श्रीकृष्ण ने वर दिया कि यह दिन सदैव नरक चौदस के नाम से याद किया जाएगा। इसी दिन भगवान विष्णु ने पराक्रमी व महान दानी राजा बलि के दंभ को अपनी कूटनीति से वामन रूप धारण कर नष्ट किया। इसे रूप चतुर्दशी भी कहते हैं। इस दिन पांच या सात दीये जलाने की परंपरा है।

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3. दीपावली: मां लक्ष्मी का है पर्व

यह अनेक घटनाक्रमों से युक्त दिन है। कार्तिक अमावस्या के दिन श्रीराम लंका विजय कर, सीता-लक्ष्मण-हनुमान व अन्य साथियों के साथ आकाश मार्ग से अयोध्या पधारे थे। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर और अहिंसा की प्रतिमूर्ति भगवान महावीर स्वामी भी इसी दिन निर्वाण को प्राप्त हुए थे। इस वर्ष विक्रम संवत् 2076 में दीपोत्सव रविवार 27 अक्टूबर 2019 को धर्मशास्त्र अनुसार प्रदोषकाल और निशीथकाल व्यापिनी अमावस्या में मनाया गया। कईं वर्षों बाद स्वाति नक्षत्र से युक्त अमावस्या में दीपमाला होगी जो समग्र राष्ट्र और समाज के लिए सुख, समृद्धि और सुभिक्षकारक सिद्ध होगी। दीपावली महापर्व में लक्ष्मी पूजन का प्रदोष काल में सर्वाधिक महत्व है। इसमें प्रदोषकाल गृहस्थियों एवं व्यापारियों के लिए तथा नीशीथकाल आगम शास्त्र विधि से पूजन के लिए उपयुक्त है।

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4. गोवर्धन पूजा: अन्नकूट के नाम से भी है विख्यात

कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा को यह पर्व आता है। इसी दिन कृष्ण ने अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को छत्र की तरह धारण करके वनस्पति तथा लोगों की इन्द्र के प्रकोप से रक्षा की थी। यह गोवर्धन पर्व अन्नकूट के नाम से विख्यात है। इस दिन नाना प्रकार के खाद्यान्न बनाए जाते हैं। घी, दूध, दही से युक्त इनका भोग भगवान को लगाया जाता है। शिल्पकार व श्रमिक वर्ग आज के दिन विश्वकर्मा का पूजन भी श्रद्धा भक्तिपूर्वक करते हैं। आज चहुंमुखी विकास व वृद्धि की कामना से दीप जलाये जाते हैं। इस वर्ष यह पर्व 28 अक्टूबर 2019 सोमवार को मनाया जाएगा।

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5. भैयादूज: बहन-भाई का पर्व

स्नेह, सौहार्द व प्रीति का प्रतीक है यम द्वितीया यानी भैया-दूज। इस दिन कार्तिक शुक्ल को यमराज अपने दिव्य स्वरूप में अपनी भगिनि यमुना से भेंट करने पहुंचते हैं। यमुना यमराज को मंगल तिलक कर स्वादिष्ट व्यंजनों का भोजन कराकर आशीर्वाद प्रदान करती है। इस दिन बहन-भाई साथ-साथ यमुना स्नान करें तो उनका स्नेह सूत्र अधिक सुदृढ़ होगा। इस बार भैया दूज 29 अक्टूबर, 2019 मंगलवार को मनाया जाएगा। क्या है दशहरे का महत्व और मान्यता?

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